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7/16/26

बगावत (कविता) :- अखिल उमराव

                       

   शीर्षक- "बगावत"- अखिल उमराव( भारतीय नौसैनिक )

निज इज्जत गिरवी रखवा करके  पक्षपात जब हो जाए।

अस्तित्व बंधे एक सीमा में व   लाज शर्म सब खो जाए ।।

टेक जमीं पर घुटने जब           दम घुटने लगे गिरे तन में।

हो चीरहरण मर्यादा का       तब शेष रहे क्या जीवन में.?

सोच संकुचन में डूबे             विस्तृत होवे  बस अहंकार।

स्वार्थ वहां हावी होकर          भावों का करता प्रतिकार।।

सत्ता शासन की नींव अगर       तानाशाही पर टिक जाए।

जनता न्याय मांगे फिर किससे जब राजा ही बिक जाए।।

साहस के सम्मुख जब-जब    दुस्साहस जमकर बरपा हो।

सब निढाल हो जाते हैं   जब अरि का बल एकतरफा हो।।

शोषण अविरत बढ़ता जाए हो   और हनन अधिकारों का।

और दमन चक्र में पिस जाए सारा साम्राज्य विचारों का।।

कुछ अपने ही जब विरोध की।       चाल सोचने लगते हैं।

लाशों का सारा मांस       गिद्ध  व बाज नोचने लगते हैं।।

 फिर मोह माया सर्वस्व त्याग      बैरागी होना पड़ता है।

जब पानी सर से ऊपर हो      तब बागी होना पड़ता है।।


जनमानस की उम्मीदों पर     जब पानी फिरने लग जाए।

व मन का संबल टूट हार कर   खुद ही गिरने लग जाए।।

धरती से लेकर अंबर तक    बस अंधकार ही व्यापित हो।

वरदान छिपा हो भय खा के मानो कि वो अभिशापित हो।।

फिर अपक्षय हो चट्टानों का         ,पर्वत में दर्रा आ जाए।

भय अपना मुंह फैला कर सारा      नींद चैन भी खा जाए।।

सूर्य उदित ना दिखे कभी           मेघों की परतें काली हों ।

नदियों की धारा उल्टी हो          सागर भी सारे खाली हों।।

जब प्रजा मरी जाए भूखी           व खाद्यान्नों में ताला हो।

सब पेश आएं अजनबियों से   जैसे कि देश निकाला हो।।

पापों की सीमा बढ़ जाए   अपराध तनिक भी हो ना क्षम्य।

जनतंत्र विवस लाचार दिखे व दमन चक्र जब हो अदम्य।।

हो विस्फोटित जब चक्षु ज्वाल   प्राणों का अपने मोह भगे।

व उत्कंठा हो जाएं प्रबल          आजादी को विद्रोह जगे।।

तब यातनाओं - विपदाओं का    अनुरागी होना पड़ता है।

जब पानी सर से ऊपर हो       तब बागी होना पड़ता है ।।


अतिवृष्टि अत्याचारों की         जनता को जब करें त्रस्त ।

व न्यायपालिका बंद रहे  , हो कार्यप्रणाली अस्त-व्यस्त।।

हो अवहेलित जब प्रेम और     कष्टों का होता ध्यान नहीं।

तब मांस काट लेते तन से    बस पूछ हिलाते स्वान नहीं।।

मिथ्या के वारों से डरकर  बुजदिल बनकर जब छुपे सत्य।

तब वहां दासता की सत्ता    आकर कर लेती आधिपत्य।।

हर उठते स्वर को दबा- दबा जिहव्या को जब जाए काटा।

जब साहस      के ही कुनबे में दिखने लग जाए सन्नाटा।।

अपनी  ही धरती  पर  जब  हों  वार  तुम्हारे  ही मन  पर।

हड़ताल सदा  ही जारी हो  या कि तुम बैठो अनशन पर।

कुछ  ही आवाज  उठाते  बाकी  घुस के  रहे मकानों में ।

बोलो   जूँ   रेंगेंगी   कैसे   , बहरी   सत्ता   के  कानों  में ।।

भौगोलिक तह हों खंड-  खंड,   काला   हो जाए इतिहास।

उन्नति रथ का जब धंसे चक्र    सर्वत्र दिखे बस सर्वनाश।।

जब हिंसा की घटनाओं पर ना किया   जाए कोई विस्मय।

संकेत यही देता है कि      आने वाली है        महाप्रलय।।

जब सुलह - सन्धि की बातों पर होने वाला ना हो विचार।

भक्षण की घात लगाए बैठे हों व्याले      जब मुंह पसार।।

आंखों पर पट्टी बांधो      अपने तन         गंगाजल डालो।

जो फन डसने आए आगे उसको अतिशीघ्र कुचल डालो।।

जब सहनशीलता हो घायल         व लगे पंख हैवानों में।

तब लांघ घरों की देहरी     लेकर चलो शस्त्र मैदानों में।।

कुंठाएं मन में हावी हो        धारण कर लेती जब कराल।

प्रतिशोधित मन से फूट पड़े    अंगारों जैसा जब उबाल।।

तो आर- पार स्पर्धा में          प्रतिभागी होना पड़ता है ।

जब पानी सर से ऊपर हो    तब बागी होना पड़ता है।।


हो लिप्त भोग में नृप सब तज   व दांव लगे हों प्यादों पर।

व डाला जाए पर्दा जब          जनता के नेक इरादों पर।।

जब कुलीन कर बल प्रयोग      निम्नों पर अत्याचार करें।

व हर उठती आवाजों का           निर्दयता से संहार करें।।

चहुंओर निरंकुशता ही  हो व        शासक हो अत्याचारी।

जब तक इस तन में प्राण रहे तब तक संघर्ष रखो जारी।।

कोई नेतृत्व उभर कर आए    जो अरियों       पर हावी हो।

सोच समझकर रखे कदम    और सारे कदम प्रभावी हो।।

उसकी उठती आवाजों का     सारी  जनता  अनुकरण करें।

जब समय मृत्यु का आ जाए सब हंस- हंस उसका वरण करें।।

आंच , सांच को आए ना       सच में ही  तपने वाला   हो।

वो खड़ा रहे निर्भीक सदा ,सच को  ही जपने वाला   हो।।

जब घोर पतन की नौबत हो तब तन- मन को तैयार रखो।

और हाथ जोड़ने     वाले अपने   हाथों में हथियार रखो।।

हर मुद्दों पर, हर कदमों     पर जब रोष जताया   जाएगा।

जब चरित्र व     हर कर्मों      पर दोष लगाया   जाएगा।।

तब कुल - कलंक मर्यादा तज कर दागी होना पड़ता है।

जब पानी सर से ऊपर हो   तब बागी होना   पड़ता है।।

     ✍️अखिलानन्द (अमौली - यूपी)

     


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