अरावली का हुंकार:अब चुप्पी तोड़नी होगी- मनवीर सिंह"ठेठ पहाड़ी"
जिस पहाड़ ने सदियों से हमें थार के मरुस्थल से बचाया, जिस अरावली ने महाराणा प्रताप जैसे वीरों को अपनी गोद में शरण दी, आज उसी के वजूद पर मशीनों के नाखून गड़े हैं। विकास के झूठे नक्शों और चंद लोगों के लाभ के लिए हमारी ऐतिहासिक विरासत को मरुस्थल बनाया जा रहा है।
मैंने अरावली के इसी दर्द और आक्रोश को अपनी एक कविता के माध्यम से व्यक्त किया है। आइये, इस मुहीम का हिस्सा बनें!
कविता का अंश:
"मैं पत्थरों की ढेर नहीं, सदियों का जलता प्रतिशोध हूँ,
मैं शांत खड़ी थी युगों से, पर अब मैं काल का क्रोध हूँ!
ठहरो ओ सत्ता के भूखों! मेरी धीरज को मत आजमाओ,
अपनी मशीनी नखों को, मेरी छाती से दूर हटाओ।"
इस संदेश को और इस कविता को इतना फैलाएं कि सत्ता की बहरी नींद और फाइलों में दबे न्याय तक अरावली की चीख पहुँच सके।
आइये मिलकर मांग करें:
अरावली में अवैध खनन पर पूर्ण रोक हो।
प्राकृतिक संसाधनों की ऐतिहासिक रक्षा सुनिश्चित हो।
आने वाली पीढ़ियों के लिए 'सांसों का सुरक्षा कवच' बना रहे।
इस मुहीम से जुड़ने के लिए इस संदेश को अपने स्टेट्स और अन्य ग्रुप्स में साझा करें।
स्वरचित कविता एवं मुहीम:
मनवीर सिंह (ठेठ पहाड़ी)
नाम– मनवीर सिंह (ठेठ पहाड़ी)
एम. ए अर्थशास्त्र
हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल (उत्तराखंड)
पता – ग्राम व पोस्ट ऑफिस, सरनौल
तहसील बड़कोट जिला उत्तरकाशी
(उत्तराखंड)
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