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अरावली का हुंकार:अब चुप्पी तोड़नी होगी- मनवीर सिंह"ठेठ पहाड़ी"

अरावली का हुंकार:अब चुप्पी तोड़नी होगी- मनवीर सिंह"ठेठ पहाड़ी"

  


    शीर्षक:- कविता "अरावली का हुंकार"  

मैं पत्थरों की ढेर नहीं, सदियों का जलता प्रतिशोध हूँ,
मैं शांत खड़ी थी युगों से, पर अब मैं काल का क्रोध हूँ।
हिमालय से प्राचीन मेरा, हर कण एक इतिहास है,
तुम जिसे खनन कहते हो, वो मेरी सांसों का विनाश है!

ठहरो ओ सत्ता के भूखों! मेरी धीरज को मत आजमाओ,
अपनी मशीनी नखों को, मेरी छाती से दूर हटाओ।
मैंने राणा को शरण दी, मैंने लोहा गलाया है,
मैंने ही तो मरुस्थल को, दिल्ली जाने से डराया है।

पर आज मुनाफाखोरों की, गिद्ध-दृष्टि मुझ पर टिकी है,
क्या न्याय की वो परिभाषा, चंद सिक्कों में बिकी है?
जैव-विविधता का कफन ओढ़, तुम महल खड़े जो करते हो,
याद रखना! तुम अपनी ही, कब्र की मिट्टी भरते हो।

कैसा यह न्याय का तमाशा? कैसी यह गजब की फाइल है?
जहाँ प्रकृति की बलि चढ़ाना ही, विकास का स्टाइल है!
मेरे बाघों की सिसकियाँ, क्या तुम्हारे कानों तक नहीं जातीं?
या तुम्हारी चेतना अब, कागजी नोटों से ही है नाती?

सुन लो! अगर मैं टूटी तो, मानसून का रुख मुड़ जाएगा,
तुम्हारे इन कंक्रीट के शहरों से, हर पत्ता झड़ जाएगा।
थार की खूनी आंधियां, जब द्वारों पर चिल्लाएंगी,
तब तुम्हारी ये कागजी फाइलें, तुम्हें बचा न पाएंगी।

आओ! अब सोशल मीडिया को, रणभूमि बनाना है,
सत्ता की इस बहरी नींद को, चीख-चीख कर जगाना है।
अरावली का अपमान अब, भारत का अपमान होगा,
हर हाथ में एक झंडा होगा, हर कंठ में ये गान होगा।

मैं अरावली हूँ! मैं ढाल हूँ! मैं ही तुम्हारी जड़ हूँ,
अगर तुमने मुझे उजाड़ा, तो मैं ही तुम्हारी प्रलय-घड़ी हूँ!
अब मुहीम चलेगी! अब शोर होगा!
अरावली को बचाने, अब चारों ओर जोर होगा।

 रचनाकार - 
मनवीर सिंह (ठेठ पहाड़ी)
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जिस पहाड़ ने सदियों से हमें थार के मरुस्थल से बचाया, जिस अरावली ने महाराणा प्रताप जैसे वीरों को अपनी गोद में शरण दी, आज उसी के वजूद पर मशीनों के नाखून गड़े हैं। विकास के झूठे नक्शों और चंद लोगों के लाभ के लिए हमारी ऐतिहासिक विरासत को मरुस्थल बनाया जा रहा है।

मैंने अरावली के इसी दर्द और आक्रोश को अपनी एक कविता के माध्यम से व्यक्त किया है। आइये, इस मुहीम का हिस्सा बनें!

कविता का अंश:

"मैं पत्थरों की ढेर नहीं, सदियों का जलता प्रतिशोध हूँ,

मैं शांत खड़ी थी युगों से, पर अब मैं काल का क्रोध हूँ!

ठहरो ओ सत्ता के भूखों! मेरी धीरज को मत आजमाओ,

अपनी मशीनी नखों को, मेरी छाती से दूर हटाओ।"

इस संदेश को और इस कविता को इतना फैलाएं कि सत्ता की बहरी नींद और फाइलों में दबे न्याय तक अरावली की चीख पहुँच सके।

 आइये मिलकर मांग करें:

 अरावली में अवैध खनन पर पूर्ण रोक हो।

 प्राकृतिक संसाधनों की ऐतिहासिक रक्षा सुनिश्चित हो।

 आने वाली पीढ़ियों के लिए 'सांसों का सुरक्षा कवच' बना रहे।

इस मुहीम से जुड़ने के लिए इस संदेश को अपने स्टेट्स और अन्य ग्रुप्स में साझा करें।

स्वरचित कविता एवं मुहीम:

मनवीर सिंह (ठेठ पहाड़ी)

नाम– मनवीर सिंह (ठेठ पहाड़ी)

एम. ए अर्थशास्त्र 

हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल (उत्तराखंड)

पता – ग्राम व पोस्ट ऑफिस, सरनौल 

तहसील बड़कोट जिला उत्तरकाशी 

(उत्तराखंड)


नोट:- अपनी रचना प्रकाशन या वीडियो साहित्य आजकल से प्रसारण हेतु साहित्य आजकल टीम को 9709772649 पर व्हाट्सएप कर संपर्क करें, या हमारे अधिकारीक ईमेल sahityaaajkal9@gmail.com पर भेजें।

                 धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम 

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