देश में बढ़ती महंगाई पर आज वही जनता मौन है, जो कुछ साल पहले सड़कों पर आवाज़ बुलंद करती थी! आखिर अब वह क्यों चुप्पी साधे है? कब चुप्पी तोड़ेगी? इसी को ध्यान में रखते हुए पूर्णिया के युवा कवि हरे कृष्ण प्रकाश ने इस बेहतरीन कविता का सृजन किया है। आइए, पढ़ते हैं और आत्मसात करते हैं। यह कविता देश के कई नामचीन समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुई है, जिसकी प्रति नीचे दी गई है।
शीर्षक:- महंगाई पर मौन क्यों?
मंदिर-मस्जिदों की खातिर,
जो खुद खूब शोर मचाती है,
नेताओं की रैली में जुटकर,
नारा खूब लगाती है।
अच्छे दिन का सपना देखकर,
अपना वोट लुटाती है,
फिर बढ़ती महंगाई पर,
जनता क्यों मौन रह जाती है?
सौ पार हुआ पेट्रोल जहाँ,
डीजल की आग झुलसाती है,
जो था कभी सस्ता सिलेंडर,
अब उसकी कीमत रुलाती है।
महंगे राशन की कड़वी मार से,
थाली भी खाली रह जाती है!
फिर बढ़ती महंगाई पर,
जनता क्यों मौन रह जाती है?
झूठे वादों के बहकावे में,
जो अपनी ही किस्मत खोती है,
थाली खाली होने पर भी,
जो जय-जयकार में सोती है।
पूछ रहे 'हरे कृष्ण' अब,
यह चेतना कब जागेगी?
फिर बढ़ती महंगाई पर,
जनता अपनी चुप्पी तोड़ेगी।
©®रचनाकार:- हरे कृष्ण प्रकाश
(युवा कवि, पूर्णियां,बिहार)
संपर्क:- sahityaaajkal9@gmail.com
यह कविता देशभर के कई अखबारों में प्रकाशित हुई है जिसकी प्रतियां यहां है!







मॅंहगाई की मार मार से त्रस्त, केन्द्रीय व्यवस्था पर कटाक्ष करती सुंदर सार्थक भावपूर्ण प्रेरक कविता। हार्दिक बधाई शुभकामनाऍं आदरणीय।
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