त्याग जहाँ मुस्काता है:- लालजी उपाध्याय
जब बाह्य शोर थम जाता है
और जग सो जाता है,
तब मन का गुप्त समंदर
धीरे-धीरे गाता है।
वह पूछे — “कौन हो तुम?”
नाम नहीं, पहचान नहीं,
तन मिट्टी, पद क्षणभंगुर,
सत्य कोई अवसान नहीं।
तुम वह नहीं जो दिखते हो,
तुम वह जो अनुभव होते हो,
दर्पण टूट भी जाए यदि,
तुम फिर भी अखंड ही होते हो।
भीतर बैठा साक्षी तुम हो,
शांत, अजर, अविनाशी,
उससे जो संबंध जुड़ जाए
कट जाए हर निराशा-फांसी
स्वप्न सुनहरे टूटेंगे,
यह जीवन का क्रम है,
हर मिलन के पीछे छिपा
एक अनिवार्य विराम है।
मोह के धागे जितने सूक्ष्म,
उतने ही दृढ़ बंधन हैं,
जो उनसे मुक्त हो गया
वही सच में जीवन है।
त्याग जहाँ मुस्काता है,
वहीं शांति का सागर है,
जो “मेरा” से ऊपर उठे
वही अमर पथिक निर्भय है।
रचनाकार:-
लालजी उपाध्याय
नोट:- अपनी रचना प्रकाशन या वीडियो साहित्य आजकल से प्रसारण हेतु साहित्य आजकल टीम को 9709772649 पर व्हाट्सएप कर संपर्क करें, या हमारे अधिकारीक ईमेल sahityaaajkal9@gmail.com पर भेजें।
धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम

No comments:
Post a Comment