शीर्षक:- प्रातः के सूर्य से सीखो
प्रातः के सूर्य से सीखो,
समय पर अपना काम करना,
रात के चन्द्रमा से सीखो,
सदा ही शांत -चित्त रहना।
तारों से सीखो, कैसी भी हो परिस्थिति,
हर समय बस जगमगाते रहना ।
फूलों से महकना सीखो,
जितना चाहे धूप सताये।
चिड़ियों से चहकना सीखो,
चाहे तुम्हे कोई रोज़ भगाये।
मधुरता कोयल से सीखो,
वर्ण का उसको खेद नहीं है।
मेघों से बरसना सीखो,
ऊंच- नीच का भेद नहीं है।
सीखो तुम धरती माता से,
चीरोगे छाती उसकी, देती उतना अन्न।
सीखो तुम निश्छल बचपन से,
कितना मधुर कितना पावन।
चींटी से सीखो तुम विपत्ति से लड़ना,
कितनी विकट हो परिस्थिति,
कमज़ोर कभी ना पड़ना।
कौवे से मत सीखना कभी बच्चों मक्कारी,
नहीं तो दुत्कारेगी तुमको दुनिया सारी।
बहुत कुछ सीख सकते हो अपने आप से,
कुंदन बनके निकलोगे जीवन की भट्टी के ताप से।
यूँ तो आप सीख सकते हो स्वयं अपने तन से,
यहाँ हमें सीख मिलती है,
प्रत्येक जीव-जीवन से।
✍️शाहनवाज फरीदाबाद
(अश्क़ फतेहपुरी)
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Nice poem
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