वो स्त्री है…- पूजा राजपुरोहित
एक अजीब-सी हलचल है,
एक अजीब-सी बेचैनी है,
जो कभी शक्ति का रूप थी,
आज वही क्यों इतनी निर्बल है?
वो माँ है—
जो अपनी नींद देकर
औरों के सपनों को सुलाती है।
वो बहन है—
जो अपने हिस्से की खुशियाँ
बिना कहे लुटाती है।
वो बेटी है—
जिसके आने से आँगन में
उम्मीदों के दीप जलते हैं।
वो पत्नी है—
जो किसी के जीवन को
अपना संसार समझ लेती है।
वो केवल एक स्त्री नहीं,
किसी के जीवन का आधार है,
फिर उसी के हिस्से में
इतना अन्याय क्यों बार-बार है?
पूजा हम राम की करते हैं,
तो आचरण रावण जैसा क्यों?
पक्ष हम पांडवों का लेते हैं,
तो कर्म कौरवों जैसे क्यों?
मंदिरों में नारी को देवी कहकर
फिर घर में उसका सम्मान क्यों भूल जाते हैं?
दुर्गा के चरणों में शीश झुकाकर
जीती-जागती स्त्री के आँसू क्यों नहीं देख पाते हैं?
जिस स्त्री से जीवन है,
उसी के जीवन को कठिन क्यों बनाते हैं?
जिसे शक्ति कहते हैं,
उसी की आवाज़ को क्यों दबाते हैं?
याद रखो—
स्त्री पर उपकार नहीं,
उसे केवल सम्मान चाहिए।
उसके पंख मत काटो,
उसे बस अपना आसमान चाहिए।
क्योंकि जिस दिन स्त्री
अपने मौन से बाहर आएगी,
उस दिन समाज को
अपने ही आईने में
अपना चेहरा नज़र आएगा।
वो अबला नहीं है…
बस बहुत सहनशील है।
और उसकी सहनशीलता को
उसकी कमजोरी समझना—
हमारी सबसे बड़ी भूल है।
✍️ लेखिका:-
पूजा राजपुरोहित
(बीकानेर राजस्थान)
साहित्य आजकल के संस्थापक की बेहतरीन रचना पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें :- Click Here
नोट:- अपनी रचना प्रकाशन या वीडियो साहित्य आजकल से प्रसारण हेतु साहित्य आजकल टीम को 9709772649 पर व्हाट्सएप कर संपर्क करें, या हमारे अधिकारीक ईमेल sahityaaajkal9@gmail.com पर भेजें।
Sahitya Aajkal सोशल मीडिया के सभी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है अतः आप हमारे Sahitya Aajkal फेसबुक पेज, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम, व्हाट्सएप चैनल पर सर्च कर जुड़ जाएं!
धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम


अच्छी रचना। हार्दिक बधाई शुभकामनाऍं।
ReplyDelete