Showing posts with label कृतिका. Show all posts
Showing posts with label कृतिका. Show all posts

1/6/26

बहुत अजीब लग रहा है :- कृतिका दाधीच

 बहुत अजीब लग रहा है :- कृतिका दाधीच 


बहुत अजीब लग रहा है :- कृतिका दाधीच 

यार, पता है कितना अजीब लग रहा है,

खुद से बात करने का जी कर रहा है।

क्या मैं वही हूँ,

जो मैं बनना चाहती थी?

या बन चुकी हूँ मैं वही,

जिनसे कभी नफ़रत होती थी…

ना चाहकर भी आज

ये मन सबसे भाग रहा है,

यार, पता है कितना अजीब लग रहा है।

अब चाहकर भी

वो चीख़ नहीं निकल पा रही

आँसुओं के साथ…

तूने ही तो सिखाया था

बिन आवाज़ के रोना।

पर अब ये बिन आवाज़ का रोना

अंदर से बहुत मार रहा है…

यार, पता है

कितना अजीब लग रहा है,

खुद से बात करने का जी कर रहा है…

हाँ, हूँ अब भी ज़िंदा मैं,

बस खुद को ढूँढने से मन डर रहा है।

बहुत ज़ख़्म खाए इस दिल ने,

जीते-जी ये रोज़ मर रहा है।

यार, खुद से बात करने का जी कर रहा है,

बहुत अजीब लग रहा है…

देखे नहीं थे कभी

ख़्वाब महलों के,

पर खुद का एक आशियाना

ज़रूर चाहा था।

ना माँगा किसी से कुछ कभी,

जो मिला…

उसी में गुज़ारा चला लिया था।

अब मन इतना बेचैन है

कि कहीं गुम हो जाने को कह रहा है…

यार,

बहुत अजीब लग रहा है।


Kritika Dadhich

(राजस्थान)


नोट:- अपनी रचना प्रकाशन या वीडियो साहित्य आजकल से प्रसारण हेतु साहित्य आजकल टीम को 9709772649 पर व्हाट्सएप कर संपर्क करें, या हमारे अधिकारीक ईमेल sahityaaajkal9@gmail.com पर भेजें।

                 धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम