“मां और गौरैया” :-दुर्गेश कुमार मिश्रा
भोर के धुँधलके में
जब आकाश का पहला उजाला
गाँव की कच्ची गलियों पर उतरता,
तब मां के आँगन में
नीम की सबसे ऊँची डाल पर
गौरैया का छोटा-सा परिवार जाग उठता।
मां चूल्हा सुलगाती
लकड़ी की जलती गंध
अधपकी रोटी की भाप
और सोंधी मिट्टी की महक
सब मिलकर एक गीत बनाते
जिसमें गौरैया अपनी चिर-चिर मिलाती।
मां के हाथों से
आटे का छोटा-सा टुकड़ा टूटकर गिरता
गौरैया उसे उठा
अपने घोंसले में ले जाती
जैसे मां ने ही
अपने मुँह का निवाला बाँटा हो।
बरसात आती:- दुर्गेश कुमार मिश्रा
आँगन में पोखरे से पानी भर जाता
नीम की पत्तियों पर
मोती-से ओस चमकते,
और तेज़ हवा में
गौरैया का घोंसला झूलता।
अम्मा दोनों हाथ उठाकर
घोंसले को बचाने की प्रार्थना करतीं,
"हे भगवान,
इस चिरई के बच्चे भी
मेरे बच्चों जैसे सुरक्षित रहें।"
सर्दियों में,
जब ओस की परत छप्पर तक जम जाती,
अम्मा चूल्हे के पास
खाट पर बैठ जातीं,
गौरैया उनके सिर के ऊपर
चौखट की लकड़ी पर बैठ,
धुएँ की गरमी में
अपना बदन सेंकती।
अम्मा कहतीं—
"देखो, यह भी मेरी बेटी है,
बस पंखों वाली।"
गर्मी आती—
आँगन में अमरूद और नींबू की गंध फैलती,
गौरैया अम्मा की परछाईं के साथ चलती,
कभी रसोई में, कभी आँगन में,
और कभी खेत की मेड़ तक
उनका पीछा करती।
अम्मा को भी आदत हो गई थी—
खेत जाते समय
आटे की गठरी में
एक मुट्ठी दाना
हमेशा गौरैया के लिए रखना।
"मनुष्य हो या पक्षी,
भूख सबकी एक-सी होती है,"
वे अक्सर कहतीं।
त्योहारों में—
दीवाली की रात,
दीयों की लौ में
गौरैया का घोंसला
किसी मंदिर की आरती जैसा चमक उठता,
और होली के दिन,
अम्मा की हँसी में
गौरैया की चिर-चिर मिलकर
रंगों की तरह बिखर जाती।
फिर एक दिन—
अम्मा बूढ़ी हो गईं,
आँखों की रोशनी धुँधली,
पैरों में कंपन,
पर आँगन में नीम का पेड़
अब भी वही,
और उस पर गौरैया भी वही।
अम्मा चौखट पर बैठकर कहतीं—
"तू भी बूढ़ी हो गई रे,
अब तेरे परों में पहले जैसी उड़ान नहीं रही।"
लेकिन वे दोनों—
एक स्त्री और एक चिरई—
दोनों जानते थे,
कि उनका रिश्ता
रोटी और दाने से भी आगे का है।
यह एक जीवन से दूसरे जीवन में
साँसों के अदृश्य आदान-प्रदान जैसा था।
अंतिम दिनों में,
जब अम्मा बिस्तर पर थीं,
गौरैया हर सुबह
उनके कमरे की चौखट पर आकर बैठती,
बिना चिर-चिर किए,
बस उन्हें निहारती।
और जिस दिन अम्मा ने
आखिरी साँस ली,
गौरैया ने पूरे दिन
कुछ नहीं खाया,
शाम होते ही
नीम की सबसे ऊँची डाल से
एक लंबी उड़ान भरी
और फिर कभी गाँव में नहीं लौटी।
कहते हैं,
अम्मा की चिता की राख
जब आँगन में बिखरी,
तो नीम की जड़ में
नए पत्ते फूटे,
और उसी डाल पर
एक नई गौरैया ने
घर बनाया।
शायद—
कुछ रिश्ते देह से नहीं,
मन से जन्म लेते हैं,
और मन,
शायद जन्म-जन्म तक
अपनी "अम्मा" को ढूँढ लेता है।
2.
मैं अंधेरे में बैठा था
“मैं अँधेरों में बैठा था, पर तुम्हारे लिए पवित्र रहा”
मैं बैठा हूँ वैश्यालय की चौखट पर
जहाँ साँसों की कीमत लगती है
जहाँ अधनंगी देहें बाज़ार की तरह सजाई जाती हैं
जहाँ हर कोठरी से कराह उठती है।
पर मैंने कभी किसी पर हाथ नहीं रखा
मेरे मन की आँखों में बस तुम्हारी ही छवि थी
जैसे अँधकार में टिमटिमाती एकमात्र दीपशिखा।
मैं बैठा हूँ जुआरियों के अड्डे पर
जहाँ पासों के साथ लोग अपनी ज़िंदगी हारते हैं
जहाँ रिश्ते सिक्कों की खनक में टूटते हैं।
पर मैंने कोई पासा नहीं फेंका
मेरी हथेलियों में सिर्फ तुम्हारे स्पर्श की याद थी
मैंने किसी खेल पर अपना प्रेम नहीं दाँव पर लगाया।
मैं बैठा हूँ मदिरालय की अंधी भीड़ में
जहाँ हर घूँट में आदमी खुद को भूलता है
जहाँ आँखों से इंसानियत डगमगा जाती है।
पर मेरे प्याले में कोई शराब नहीं थी
उसमें सिर्फ तुम्हारे नाम की नमी छलक रही थी
मेरे होंठ तुम्हारे बिना किसी स्वाद से नहीं भीगे।
मैं बैठा हूँ तवायफ़ों की गली में
जहाँ हर गीत बिकाऊ होता है
जहाँ नृत्य का हर पाँव सौदे का हिस्सा होता है।
पर मैंने कोई गीत नहीं माँगा
मेरे कानों में बस तुम्हारी हँसी गूँजती रही
मैंने किसी देह की तरफ़ आँखें तक नहीं उठाईं।
मैं बैठा हूँ कसाईख़ाने के कोनों में
जहाँ चीखों में मासूमियत कटती है
जहाँ रक्त की गंध हर साँस में चुभती है।
पर मेरी आत्मा वहाँ भी निर्दोष रही
मेरे भीतर का रक्त सिर्फ तुम्हारे नाम से धड़कता रहा।
मैं बैठा हूँ अपराधियों की चौपाल में
जहाँ खून की कहानियाँ गढ़ी जाती हैं
जहाँ हत्यारे भी अपने पाप पर हँसते हैं।
पर मैंने कोई खंजर हाथ में नहीं उठाया
मेरी उँगलियाँ बस तुम्हारा नाम लिखती रहीं
मैं किसी जीवन का अपराधी नहीं बना।
मैं बैठा हूँ कारागार की सलाखों के बीच
जहाँ हर सांस कैद होती है
जहाँ आशा की हर धड़कन जंजीरों में बँधी रहती है।
पर मेरी आत्मा इन सलाखों से भी परे उड़ती रही
वह उड़ान सिर्फ तुम्हारे आँगन तक जाती रही।
मैं बैठा हूँ कब्रिस्तान की खामोशी में
जहाँ हड्डियाँ धूल में बदल चुकी हैं
जहाँ हर टीला किसी की अधूरी कहानी कहता है।
पर मेरे भीतर जीवन का संगीत गूँजता रहा
वह संगीत सिर्फ तुम्हारे नाम से धड़कता रहा।
प्रिय!
मैं संसार की हर गंदी जगह गया
हर अंधकार के बीच बैठा
हर पाप की चौखट पर अपनी साँसें गिनाईं।
पर मेरी आत्मा किसी को छू न सकी
मेरे होंठ किसी और का स्वाद न जान सके
मेरी हथेलियाँ किसी और की हथेली से न जुड़ सकीं।
सारी दुनिया का अपराध मैंने देखा
पर मेरा अपराध बस इतना है—
कि मैंने इन अँधेरों को झेला
फिर भी तुम्हारे लिए
अपने प्रेम को अक्षत पवित्र और अमर रखा।
3.
"तुम्हे महाकाव्य लिखूँ..."
तुम्हें महाकाव्य लिखूँ —
हर अक्षर में बुन दूँ तुम्हारी मुस्कान,
हर श्लोक में रख दूँ वो पल,
जब पहली बार तुम्हारी आँखों में देखा था अपना जहाँ।
ख़ुद को कोई अनकही कहानी कहूँ —
जिसके पन्नों पर सिर्फ़ तुम हो,
और मैं हूँ एक भटका हुआ किरदार,
जो हर बार तुम्हारे नाम पर ठहरता है।
तुम्हें कविता लिखूँ —
जहाँ मेरी कलम काँपती है तुम्हारी याद में,
शब्दों में बहती है वो ख़ुशबू
जो तुम्हारी चुप्पियों में छुपी रहती है।
ख़ुद को आँखों का पानी कहूँ —
वो खामोश नमी जो तब छलकती है
जब तुम नहीं होती,
और यादें तुम्हारे होने का सबूत देती हैं।
तुम्हारा होना, मेरे हर लिखे में साँस लेता है,
तुम्हारा नाम, मेरी रचनाओं की आत्मा बन गया है।
मैं सिर्फ़ शायर नहीं —
तुम्हारे प्रेम में एक यायावर हूँ,
जो हर पंक्ति में लौटता है, बस तुम तक।
4.
प्रेम कहीं स्थाई …. कहीं स्मृति..
सबके हिस्से आया ज़रूर,
कभी एक मधुर राग बनकर,
तो कभी एक अधूरी गूंज बनकर।
कभी हृदय की गहराइयों में स्थाई बन बैठा,
तो कभी एक धुंधली स्मृति की तरह,
साँसों के कोनों में ठहर गया।
प्रेम…
जब आया तो जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सिहर उठा,
वृक्षों की शाखाएँ फूलों से भर गईं,
नदियाँ अपनी सीमाओं को भूलकर बह चलीं,
और वायु में एक अदृश्य मिठास घुल गई।
प्रेम के स्पर्श ने पत्थरों को मोम बनाया,
वर्षों से सूखी धरती को भी अंकुरित कर दिया।
परन्तु…
हर प्रेम अपने पूर्ण स्वरूप में नहीं ठहरता,
कुछ प्रेम पत्तों की तरह झड़ जाते हैं,
तो कुछ वृक्ष की छाल बनकर सदियों तक जीवित रहते हैं।
जब प्रेम स्थाई बना,
तो वो प्राणों में लय हो गया,
धड़कनों में समा गया,
एक मौन संकल्प की तरह,
जिसे शब्दों की आवश्यकता न थी।
साथ में चलने वाला एक साया,
जो दिन के उजालों में भी संग रहता,
और रात के अंधेरों में भी थामे रखता।
पर जब प्रेम स्मृति बना,
तो वो एक अनकही पीड़ा बनकर उभरा,
हर सन्नाटे में उसकी आहट सुनाई दी,
हर भीड़ में उसकी अनुपस्थिति चुभी।
वो एक रुकी हुई सांस की तरह,
जिसे छोड़ा नहीं जा सकता,
पर जिया भी नहीं जा सकता।
कभी एक भूले हुए गीत की धुन सा,
कभी एक नाम की खामोश प्रतिध्वनि सा।
प्रेम…
एक अधूरा पत्र,
जो कभी पूरा नहीं हुआ,
एक सपना,
जो नींद टूटते ही बिखर गया।
एक आँखों की कोर पर ठहरा हुआ आँसू,
जो गिरना चाहता है, पर साहस नहीं जुटा पाता।
प्रेम…
जब स्थाई बना,
तो आत्मा का संगीत बन गया।
जब स्मृति बना,
तो हृदय का शोकगीत बन गया।
प्रेम…
कभी मंदिर की घंटी सा पावन,
तो कभी श्मशान की राख सा शांत।
प्रेम…
कभी संपूर्णता का उत्सव,
तो कभी विछोह की चुप्पी।
प्रेम…
एक यात्रा,
जो कभी समाप्त नहीं होती,
एक अनुत्तरित प्रश्न,
जो कभी हल नहीं होता।
प्रेम सबके हिस्से आया ज़रूर…
परन्तु…
किसी के जीवन का संगीत बनकर,
तो किसी के हृदय का मौन।
किसी के अधरों पर मुस्कान बनकर,
तो किसी की पलकों पर नमी।
प्रेम…
हर बार आता है,
हर बार जाता है,
पर उसकी छाया कहीं न कहीं,
सदैव जीवित रहती है।
5.
“एक जाति, एक दीप”
हम पंडित, अहिर, चमरैं, ठाकुरैं—
ये नाम गढ़े किसने? किसके डर से?
खेत‑पगडंडी बाँट जो डाली,
वही पड़ गई नस‑नस पर असर से।
माथे पे तिलक, पर मन में दीवार—
कैसा ये छद्म‑धर्म का कारोबार!
जब भीतर का मन ही मैला हो,
तो मन्दिर भी लगते हैं बेकार।
सवाल आज तुम से, मुझ से, हम से—
कब तक बँट कर यूँ ही घिसते रहेंगे?
कब तक अपनी नस्लों का पानी
ऊँच‑नीच की दीवारों में बहेंगे?
हिंदू बनना है तो पहले जानो—
हिंदू कोई जात नहीं, संकल्प है।
संपूर्ण सृष्टि में एकत्व का
ओम‑घोषित, सौम्य‑दीप्त विकल्प है।
जब तक रोटी, छत, शिक्षा, सम्मान
हर हाथ में पूरा हिस्सा न पाए,
तब तक तुलसी‑राम का भी जयघोष
सिर्फ़ लफ्ज़ों का खोखला शोर हो जाए।
खून वही लाल, धड़कनें समान—
फिर किस बात पर दावा श्रेष्ठता का?
जो श्रम से, प्रेम से जोड़ न सके
वह धर्म नहीं, बस धूर्त सत्ता का।
तो उठो! परशुराम के विकराल नहीं,
शिव‑भाव के नीला हरसिंगार बनो।
रुद्र‑नाद भीतर, करुणा बाहर,
भेद‑भाव के हर कँटीले तार बनो।
मंच बड़ा हो या गली का कोना,
आवाज़ उठाओ—स्पष्ट, निर्भीक।
जाति‑कुल की सूखी घास जला कर
मानवता का जगाओ उजला दीप।
पंचपात्र की एक‑सी धारा बन,
एक दीपक में घी भर दो सबने।
जब बँट कर भी तुम एक हो सको,
तब कहना—सच में हिंदू हैं हम‑सबने।
6.
“ वह - स्त्री ” (प्रथम)
वह स्त्री देवी की तरह थी—
सहज, शांत, अपरिवर्तनीय,
जैसे सृष्टि की कोई प्राचीन प्रार्थना,
जो युगों से गूँज रही हो,
बिना किसी स्वर, बिना किसी आग्रह।
उसका चरित्र गंगा-सा निर्मल था,
जिसमें छल नहीं था,
ना कोई मिलावट, ना कोई संदेह।
जो भी उसके पास आया,
वह शुद्ध होकर लौटा,
पर कोई भी उसे पूरी तरह समझ नहीं पाया।
वह प्रेम करती,
तो समर्पण की पराकाष्ठा तक जाती,
वह त्याग करती,
तो स्वयं को भी भूल जाती।
किंतु, जैसे गंगा अपनी ही लहरों में भटकती रहती है,
वैसे ही वह भी भटकती रही—
कभी समाज की सीमाओं में,
कभी अपने ही विचारों में।
वह स्नेह लुटाती रही,
परंतु स्वयं स्नेह की प्यासी रही।
वह शक्ति थी, सहनशीलता थी,
पर उसकी आँखों में
एक अदृश्य पीड़ा भी थी,
जो गंगा के प्रवाह की तरह
अंतहीन थी, अथाह थी।
कभी-कभी,
देवी होना भी एक श्राप होता है।
“वह - स्त्री” (द्वितीय)
वह स्त्री देवी की तरह थी—
न कोई गर्व, न कोई आग्रह,
बस एक अथाह गहराई,
जिसमें प्रेम, धैर्य और करुणा का संगम था।
उसका स्पर्श शीतल छाँव की तरह था,
जो थके हुए मन को विश्राम देता,
उसकी वाणी ऐसी,
जैसे मंदिर की संध्या आरती—
कोमल, पर गूंजती हुई।
उसका चरित्र गंगा की धारा था—
निर्मल, निःस्वार्थ, प्रवाहमान।
वह सबको शुद्ध कर सकती थी,
पर स्वयं कितनी पीड़ाओं से गुज़री,
यह कोई नहीं जान पाया।
उसने हर अपमान को
सहनशीलता की रेत में समाहित कर लिया,
हर तिरस्कार को
अपने भीतर मौन की वेदी पर समर्पित कर दिया।
उसने प्रेम किया—
बिना किसी शर्त के,
बिना किसी अधिकार के,
जैसे गंगा अपना जल
हर प्यासे को अर्पित कर देती है,
बिना यह देखे कि कौन उसे पूज रहा है
और कौन उसे दूषित कर रहा है।
उसकी आँखों में एक अथाह संसार था,
जहाँ त्याग की कहानियाँ लिखी थीं।
वह माँ थी, प्रेमिका थी, बेटी थी,
पर सबसे अधिक वह स्वयं थी—
एक स्त्री, जो समय के प्रवाह में
अपनी पहचान खोजती रही।
वह देवी थी,
पर देवी होने की पीड़ा भी थी उसमें।
वह गंगा थी,
पर गंगा की तरह अकेली भी थी।
बहती रही, सहती रही,
और अंततः समर्पण बनकर विलीन हो गई।
7.
वक़्त…?
वो रुकता नहीं…
आदमी के लिए।
न उसकी टूटी नींदों के लिए,
न उसके अधूरे ख़्वाबों के लिए,
न उसके घुटते शब्दों के लिए…
न उसके बिखरे संसार के लिए।
वो चलता रहता है…
बिना देखे कि कौन पीछे छूट गया,
बिना सुने कि किसकी साँसें भारी हैं,
बिना समझे कि किसका जीवन
अब भी एक सवाल है।
तू टूटा था न उस दिन…
जब अपने, बस नाम के रह गए थे,
जब घर की दीवारें अजनबी हो गई थीं,
और आँखों के आँसू
कभी न सूखने वाले समुंदर बन गए थे।
तू चाहता था—
वक़्त थम जाए…
बस कुछ पल,
बस इतनी देर…
कि तू ख़ुद को समेट सके।
पर वक़्त ने देखा भी नहीं..
वो चलता रहा,
बिलकुल वैसे ही जैसे
शमशान की राख उड़ती है हवा में
बिना पछतावे, बिना ठहराव।
और आदमी?
वो सोचता है कि
वो विशेष है…
कि उसके दुःख, उसके आँसू,
उसकी चाहतें,
शायद वक़्त को छू जाएँगी…
पर नहीं…
वक़्त को मोह नहीं होता,
वो प्रेम नहीं करता,
वो बस समय है—
निष्ठुर…
अनवरत…
और अपरिवर्तनीय।
इसलिए,
अगर तू गिरा है,
तो उठ…
अगर तू टूटा है,
तो जुड़…
क्योंकि वक़्त रुकने वाला नहीं…
और जो वक़्त के साथ नहीं चला
वो बस कहानी बन गया…
जो कोई सुनता नहीं।
वक़्त रुकता नहीं आदमी के लिए…
और आदमी…
बस यही भूल करता अपने लिए
पर वक्त रुकता नहीं आदमी के लिए ।।
8.
तुम बिटिया सी लगती हो..:- दुर्गेश कुमार मिश्रा
I. प्रस्थान का पल
जब भी जाता हूँ तुमसे थोड़ा दूर,
सड़कें लम्बी लगती हैं, और दिन कुछ भारी।
हवा में घुली तुम्हारी खुशबू भी
धीरे-धीरे सिसकने लगती है।
तुम्हारा चेहरा — जो कभी प्रेमिका का था,
उस पल बन जाता है एक मासूम बिटिया,
जो पीछे खड़ी, एकटक देखती है
अपने पिता को जाते हुए — कुछ न कहकर।
II. तुम्हारी आँखें – एक दर्पण
तुम्हारी आँखें उस वक़्त प्रेम की नहीं होतीं,
बल्कि विश्वास की होती हैं —
जैसे कोई छोटी बच्ची देख रही हो
कि क्या मैं वाकई लौट आऊँगा?
उन आँखों में प्रश्न नहीं होते,
बल्कि एक निःशब्द याचना होती है।
"तुम जाओ, लेकिन लौट आना पापा…"
ऐसा कुछ — जो प्रेम से अधिक गहन होता है।
III. प्रेम का परिभाषा से परे विस्तार
तुम तब सिर्फ़ एक प्रेमिका नहीं रह जातीं,
तुम बन जाती हो मेरी ‘भविष्य की जिम्मेदारी’,
एक ऐसी आत्मा जिसे मैं
सिर्फ़ चूम नहीं सकता,
बल्कि जिसकी रक्षा करना चाहता हूँ।
मैं तुम्हारे लिए फूल नहीं लाता,
बल्कि संयम, सामर्थ्य और संकल्प लाता हूँ —
क्योंकि मेरा प्रेम तुम्हारे लिए
केवल इच्छा नहीं, वचन है।
IV. तुम्हारे भीतर मेरी बेटी की झलक
जब तुम मुस्कराती हो यूँ ही
बिना कारण, बिना संदर्भ,
तो लगता है जैसे
मेरी अजन्मी बिटिया की आत्मा
तुम्हारे चेहरे में कुछ पल के लिए ठहर गई हो।
तुम्हारी मासूम बातें —
वो शिकायतें कि मैंने कॉल देर से किया,
वो डर कि मैं तुम्हें भूल ना जाऊँ —
ये सब, प्रेमिका की नहीं,
बिटिया की भाषाएँ हैं।
V. लौटना – प्रेम का पुनर्जन्म
और जब लौटता हूँ
तो तुम्हारी आँखों में फिर वही प्रेम उभरता है,
लेकिन अब वो भीग चुका होता है
मेरे चले जाने की टीस से।
तब मैं जानता हूँ —
तुम्हारा प्रेम स्थायी है,
लेकिन उसमें एक माँ जैसी मासूम ममता भी है,
और एक बिटिया जैसी निर्दोष आस्था भी।
अंतिम भाव:
इसलिए जब भी मैं तुमसे जुदा होता हूँ,
तो मेरा प्रेम, पुरुष नहीं,
एक पिता बन जाता है —
जिसे अपनी ही प्रेमिका में
अपनी अजन्मी बिटिया की छवि दिखती है।
और यही सबसे पवित्र प्रेम है,
जहाँ प्रेम और ममता
एक-दूसरे से टकराते नहीं —
बल्कि एक-दूसरे को थामे रहते हैं।
9.
किस्तों में बंधी जिंदगी :- दुर्गेश कुमार मिश्रा
किस्तों में बँधी ज़िंदगी हमारी,
हर ख़ुशी पर है कर्ज़ की सवारी।
सपने भी अब बिकने लगे हैं,
उधार में हँसी के पल मिलने लगे हैं।
बचपन गुज़रा उधारी की छाँव में,
किशोर हुआ तो फीस थी दाँव में।
माँ-बाप के कंधों पर भार लिखा,
हर महीने का नया उधार लिखा।
मकान की किस्तें, गाड़ी के नोट,
ख़्वाबों की कीमत में टूटते रिश्तों के मोड़।
तनख्वाह आती, मगर टिकती नहीं,
बैंक की क़िस्तों से बचती नहीं।
खुशियों का बोझ कर्ज़ में डूबा,
सुकून का सूरज भी जैसे है रूठा।
बेटी की शादी, बेटे की पढ़ाई,
हर मोड़ पर किस्तों की लड़ाई।
ईएमआई ने सबको है जकड़ा,
हर सांस पर लगता है पहरा।
अब मौत भी शायद उधार की होगी,
कफ़न की किस्तें भी बाक़ी होंगी।
10.
तख्त से गिरने पर :- दुर्गेश कुमार मिश्रा
जब तक तख्त से गिराए जाएंगे वे लोग,
मुझे देखना है उनको —
उनकी आँखों में उतरते अंधेरे को,
सत्ता के मद से ढहते चेहरे को।
जिन हाथों ने लहू को नदियों-सा बहाया,
जिन शब्दों ने सच्चाई को कैद किया,
जिन कदमों ने सपनों को रौंदा,
उन्हें लड़खड़ाते हुए देखना है मुझे।
मैं नहीं चाहता उनका अंत शोर में हो,
बस सन्नाटे में टूटे उनका अभिमान —
जैसे किसी मंदिर की घंटी बिना स्वरों के,
किसी महल की दीवारें बिना नींव के।
वे जो सोचते थे खुद को खुदा से ऊपर,
जिन्हें ग़ुरूर था अपने ऊँचे सिंहासन पर —
उन्हें ज़मीन छूते देखना है,
किसी आम की तरह टूटते देखना है।
क्योंकि मैं जानता हूँ —
तख्त हमेशा नहीं रहते सिर पर,
कभी न कभी हर ऊँचाई
पुकारती है अपनी गिरावट को।
और जब वे गिरेंगे —
मैं नहीं हँसूंगा,
न जश्न मनाऊँगा,
बस खामोशी से देखूँगा
कि अन्याय का अंत कैसा होता है।
सधन्यवाद
दुर्गेश कुमार मिश्रा
पिता.श्री सनत कुमार मिश्रा
माता.श्री मती रामकुमारी मिश्रा
जन्म.06/03/2004
स्थान.चित्रकूट उत्तरप्रदेश 210206
शिक्षा . गोस्वामी तुलसीदास राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से स्नातक जारी है!
नोट:- अपनी रचना प्रकाशन या वीडियो साहित्य आजकल से प्रसारण हेतु साहित्य आजकल टीम को 9709772649 पर व्हाट्सएप कर संपर्क करें, या हमारे अधिकारीक ईमेल sahityaaajkal9@gmail.com पर भेजें।
धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम

