जंतर-मंतर: छात्रों की आवाज़"
20 जुलाई
हाय रे बेरहम सरकार,
हाय रे पत्थर-दिल सरकार,
हाय रे तानाशाही जालिम सरकार।
हम छात्रों ने तो बस
तुमसे व्यवस्था में सुधार की गुहार लगाई,
और तुमने हमें जवाब में
आँसू गैस के गोले और लाठियाँ बरसाईं।
पूछता है भारत—
क्या लोकतांत्रिक देश में
संवैधानिक तरीके से
अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना गुनाह है?
अगर यही गुनाह है,
तो हमारे संविधान प्रदत्त
मौलिक अधिकारों का सम्मान कहाँ रह गया?
सत्ता के अहंकार में
इतना मत डूबो,
तुम्हें याद ही होगा
5 जून 1974 का वह छात्र आंदोलन,
जब छात्रों के आंदोलन ने
एक बड़े जनआंदोलन को जन्म दिया था,
और अंततः इंदिरा गांधी की सरकार
सत्ता से बाहर हो गई थी।
— रंजीत कुमार
(पूर्णियां, बिहार)

