शीर्षक :- अजनबी
भीड़ भाड़ की इन सड़को पर
कोई अनजाना मिल जाता है
जान न पहचान कोई उससे पर
क्यों अपना -सा लग जाता है
थोड़ी-सी मुस्कान लिए होठों पर
कोई अफसाना -सा लगता था
उसकी इन खामोश निगाहों से
क्यों कोई अतीत जग जाता था
ना कोई रिश्ता , ना कोई पहचान
कोई उससे जुड़ाव-सा लग जाता हैं
फिर अजनबियों की इस दुनिया में
क्यों इतना करीब वों हों जाता हैं
क्षण भर जीवन के संग चला
बीच राहों में फिर यू खो गया
जैसे सुखे पत्तों सा,
हवा संग वों कहीं बह गया
पर उसकी उन शांत निगाहों में,
एक प्रश्न ठहर जाता है—
क्यों हर अजनबी इस दुनिया में
अपना-सा लग जाता है?
✍️ लारा उपाध्याय
(पाली, राजस्थान)
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