शीर्षक:- बेचारा मन बड़ा घबराया है
उस समय से लेके,
इस समय के अंतराल में।
लोगों ने इतना घुमाया है,,
बेचारा मन इससे बड़ा घबराया है।।
बदलते हुए हर दौर में,
किसने कैसा प्रश्न लगाया है।
इन्हीं सभी प्रश्नों से,,
बेचारा मन बड़ा घबराया है।।
आंधी सी वह बातें,
जिसने नींदों को उड़ाया है।
अपने मार्ग के कांटों से,,
बेचारा नाजुक मन घबराया है।।
ठोकड़ो ने ही तो,
हमें आगे बढ़ाना सिखाया है।
फिर भी इन्हीं ठोकड़ों से,,
बेचारा चंचल मन घबराया है।।
साक्षी कुमारी
पिता:- राकेश झा
(सहरसा बिहार)
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