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6/8/26

आज़ाद ग़ज़ल के जनक और प्रखर हस्ताक्षर हैं सिद्धेश्वर : अपूर्व कुमार

पटना, 08 जून 2026। भारतीय काव्य-संस्कृति की परंपरा में समय-समय पर परिवर्तन और नए प्रयोग होते रहे हैं। पारंपरिक छंदों की सीमाओं को तोड़ते हुए जब महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने छंद का गहन ज्ञान होने के बावजूद पहली बार मुक्तछंद कविता लिखी, तब समकालीन रचनाकारों और संपादकों ने उसका घोर विरोध किया था। उस समय निराला ने कहा था कि वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण कविता को छंद से कुछ आज़ादी चाहिए। यही आज़ादी आगे चलकर उनकी कविता की विशिष्ट पहचान बनी और उन्हें साहित्य के इतिहास-पुरुषों में प्रतिष्ठित कर गई।

साहित्यिक संस्था भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वावधान में गूगल मीट के माध्यम से आयोजित तथा यूट्यूब पर लाइव प्रसारित “हेलो फेसबुक कवि सम्मेलन” की अध्यक्षता करते हुए युवा कवि अपूर्व कुमार ने उक्त विचार व्यक्त किए। उन्होंने आज़ाद ग़ज़ल की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि वर्तमान समय में भी साहित्य में इस प्रकार के नए प्रयोग हो रहे हैं। पारंपरिक ग़ज़ल की परंपरा से आगे बढ़ते हुए महाकवि गोपालदास ‘नीरज’ ने ‘गीतिका’ तथा विख्यात शायर दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़ल को नई पहचान दी। प्रारंभिक विरोध के बावजूद आज इन प्रयोगों को व्यापक स्वीकृति प्राप्त है। हिंदी ग़ज़ल आज सर्वाधिक लोकप्रिय काव्य-विधाओं में से एक बन चुकी है।


उन्होंने कहा कि वर्तमान समय की नब्ज़ को पहचानते हुए वरिष्ठ कवि सिद्धेश्वर उर्दू और हिंदी ग़ज़ल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ‘आज़ाद ग़ज़ल’ का सृजन कर रहे हैं। तमाम विरोध के बावजूद देशभर के अनेक कवियों ने आज़ाद ग़ज़ल कहना प्रारंभ कर दिया है। हृदय से निकली यह ग़ज़ल मात्राओं की स्वतंत्रता अर्थात बहर की आज़ादी के साथ रदिफ काफिया के साथ अपनी विशिष्ट पहचान बना रही है। पत्र-पत्रिकाओं, सोशल मीडिया और काव्य-मंचों पर इसकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ रही है।


डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना ने उचित ही कहा है कि जिस प्रकार लघुकथा की स्वतंत्र पहचान स्थापित करने के लिए आज डॉ. सतीशराज पुष्करणा को स्मरण किया जाता है, उसी प्रकार आने वाले समय में आज़ाद ग़ज़ल के लिए सिद्धेश्वर को याद किया जाएगा। सिद्धेश्वर आज़ाद ग़ज़ल के जनक और उसके प्रखर हस्ताक्षर हैं।


समकालीन कविता के स्वरूप और आज़ाद ग़ज़ल पर विचार रखते हुए कार्यक्रम का संचालन कर रहे सिद्धेश्वर ने अपनी कुछ आज़ाद ग़ज़लें भी प्रस्तुत कीं—"ज़िंदगी, तू मौत से घबराती क्यों है? /जीने के पहले तू मर जाती क्यों है?/ रात को भला कैसे आएगी भरपूर रोशनी, /सूरज के सामने तू गिड़गिड़ाती क्यों है?"

ऑनलाइन आयोजित इस कवि सम्मेलन में शामिल अधिकांश कवियों ने आज़ाद ग़ज़लें प्रस्तुत कीं। इनमें प्रमुख थे— संतोष मालवीय, अपूर्व कुमार, डॉ. अनुज प्रभात, सपना चंद्रा, सिद्धेश्वर, रशीद गौरी, ऋचा वर्मा, सुरेंद्र अरोड़ा, राज प्रिया रानी, नंदकुमार मिश्र एवं निर्मला कर्ण ।

इसके अतिरिक्त ऑनलाइन उपस्थित रचनाकारों में दुर्गेश मोहन, लखन महतो, प्रणय सिंह, एकलव्य केसरी, सुनील कुमार पाठक, श्याम सुंदर अग्रवाल, सेवा सदन प्रसाद, कुलवंत मिश्रा, प्रो. शरद नारायण खरे, सुनील कुमार उपाध्याय, खुशबू मिश्रा तथा कल्पना सिंह आदि की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों एवं श्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अनुज प्रभात ने किया।


प्रस्तुति : बीना गुप्ता

(जनसंपर्क अधिकारी, भारतीय युवा साहित्यकार परिषद, पटना)


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