5/27/26

शिवत्व (कविता) - लालजी उपाध्याय

शिवत्व (कविता) - लालजी उपाध्याय


मैंने शिव को मंदिरों में खोजा।

घंटियों की ध्वनि में,

धूप की सुगंध में,

मंत्रों की गूँज में।

क्षण भर शांति मिली,

पर भीतर का तूफ़ान शांत नहीं हुआ।

तब प्रश्न उठा —

क्या शिव बाहर हैं,

या भीतर छिपे हैं?

और उसी प्रश्न से

यात्रा भीतर मुड़ गई।


मेरे भीतर क्रोध था।

अन्याय पर,

अस्वीकृति पर,

असफलताओं पर।

वह ज्वालामुखी की तरह था—

दबा हुआ, पर प्रचंड।

मैं उसे पवित्र नहीं मानता था।

मैं उसे दोष समझता था।

पर एक दिन समझ आया —

ऊर्जा न अच्छी होती है, न बुरी।

दिशा तय करती है उसका स्वरूप।

क्रोध को दबाने से वह विष बनता है।

समझने से वह शक्ति।


शिवत्व का अर्थ है

विष को पहचानना।

ईर्ष्या,अहंकार,लोभ,तुलना —

ये सब भीतर के विष हैं।

मैंने पहले उन्हें छुपाया।

फिर उनसे भागा।

पर जब सामना किया,

तो जाना —

उन्हें बाहर फेंकना संभव नहीं।

उन्हें रूपांतरित करना होगा।

जैसे नीलकंठ ने विष पिया,

वैसे ही मुझे अपने अंधकार को स्वीकारना पड़ा।


रूपांतरण शांति से नहीं होता।

कभी भीतर तांडव करना पड़ता है।

पुरानी धारणाएँ तोड़नी पड़ती हैं।

झूठी पहचानों को गिराना पड़ता है।

जब अहंकार टूटता है,

तो दर्द होता है।

पर वही तांडव

नई चेतना को जन्म देता है।

मैंने अपने भीतर

एक-एक करके दीवारें गिराईं।

और हर गिरती दीवार के साथ

मैं हल्का होता गया।


तांडव के बाद

एक गहरी शांति आई।

जैसे तूफ़ान के बाद

निर्मल आकाश।

मैं मौन में बैठा।

विचार आते रहे,

पर मैं उनसे जुड़ा नहीं।

मैं साक्षी बन गया।

और उसी साक्षी भाव में

शिवत्व का प्रथम अनुभव हुआ।

न प्रतिक्रिया,

न आवेग।

बस सजगता।


शिव केवल संहारक नहीं।

वह करुणा का सागर हैं।

जब मैंने स्वयं को क्षमा किया,

तभी दूसरों को भी क्षमा कर पाया।

पहले मैं न्याय चाहता था।

अब समझ चाहता हूँ।

पहले मैं विजय चाहता था।

अब संतुलन चाहता हूँ।

शिवत्व संतुलन है—

ऊर्जा और शांति का।

शक्ति और करुणा का।


शिवत्व का एक आयाम है —

विरक्ति।

त्याग नहीं,

पर आसक्ति से मुक्त होना।

जब प्रशंसा मिले,

तो अहंकार न बढ़े।

जब आलोचना मिले,

तो आत्मा न गिरे।

यह सरल नहीं।

पर अभ्यास से

मन स्थिर होता है।

और स्थिर मन ही

शिव का आसन है।


मैंने ध्यान को अभ्यास बनाया।

शुरू में कठिन था।

विचार रुकते नहीं थे।

पर धीरे-धीरे

उनके बीच अंतराल दिखने लगे।

उसी अंतराल में

एक गहरा प्रकाश था।

वह प्रकाश शांत था,

पर जीवित।

वही शिवत्व की धड़कन थी।


अंततः समझ आया —

शिवत्व प्रयास का भी पार है।

जब सब नियंत्रण छोड़ दिया,

जब जीवन को स्वीकार लिया,

जब परिणामों की चिंता कम हुई —

तब एक सहजता आई।

समर्पण हार नहीं है।

वह विश्वास है।

और विश्वास में

भीतर की कठोरता पिघल जाती है।


अब मैं मंदिर जाता हूँ,

पर जानता हूँ —

वह प्रतीक है।

शिव कोई दूर बैठा देव नहीं।

वह चेतना का शिखर है।

जब मैं सजग हूँ —

वह शिव है।

जब मैं संतुलित हूँ —

वह शिव है।

जब मैं करुणामय हूँ —

वह शिव है।

मैं पूर्ण नहीं,

पर यात्रा पर हूँ।

और हर दिन

जब मैं अपने अंधकार को प्रकाश में बदलता हूं 

तब थोड़ा शिव 

मेरे भीतर जन्म लेता है 


रचनाकार:- लालजी उपाध्याय

स्नातक (बी.ए.) अंतिम वर्ष के छात्र एवं 

निजी विद्यालय के शिक्षक

लौवा टेपरा, बेलसर, गोंडा, उत्तर प्रदेश

पिता का नाम : परमतमा दीन उपाध्याय


नोट:- अपनी रचना प्रकाशन या वीडियो साहित्य आजकल से प्रसारण हेतु साहित्य आजकल टीम को 9709772649 पर व्हाट्सएप कर संपर्क करें, या हमारे अधिकारीक ईमेल sahityaaajkal9@gmail.com पर भेजें।

                 धन्यवाद :- साहित्य आजकल टीम 


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