"अभी दो क़दम चलना है"
उम्मीदे सहर पर अभी बने
रहना है
ग़मे-ए-जहां में और ग़म
सहना है
नयी आशाओंकी नहीं लहरों
पर बहना है
नये मोडपर अभी दो क़दम
चलना है
सागर के लहरों को किनारे
की ओर बढना है
हसते खेलते चिन्हें तुफानों
पर चढ़ना है
मौजों से टकराना है मझधारों
से लडना है
नयी उमंगोसे अभी दो क़दम
चलना है
कुंद तेज हवा जुल्म ढा रही है
हंस हंसकर फूलों को मुरझा
रही है
एक नहीं सौ बार ठोकर
खाकर संभलना है
नये डगर पर अभी दो क़दम
चलना है
वीरान चमन में हर डाली को
है ग़म
अब कोई पते- पते में नहीं है
दम
थकी सांसो से और भी सांस
लेना है
नये दम से अभी दो क़दम
चलना है
आदमी आदमी से यारी
निभाना है
गले से गले मिलकर प्रेम
बढ़ाना है
दोस्त-दुश्मन के फासले
मिटाना है "किरण"
नयी मंजिल पर अभी दो
क़दम चलना है।
✍️ बापुरे "किरण"
(लातूर, महाराष्ट्र)
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