शीर्षक :- मांग है
यह जीवन अनचाही मौजों
के संग है
कभी इधर कभी उधर उलझन
में दंग है
बादल जैसे अस्थिर मन को
किधर ले जाऊं
जिधर जाऊं उधर ग़म की ही
एक तरंग है
सुख और दुःख की यहाँ
निरन्तर जंग है
किसे हार कर किसे पाऊं
सब भंग है
चैन कभी मिलती नहीं किसी
ज़ाम से
हर पल लबोंपर मचलती
एक मांग है
आते जाते आफतों से जिंदगी
तंग है फिर कोई क़यामत
आने का रंग है
गुज़र अब मुश्किलों के
सत-संग है "किरण "
देवकर नियति को
तबीयत दंग है
बापुरे "किरण "

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