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7/17/26

मैं भी बेफिक्र हुआ करता था( कविता):- नीलम साहू



  शीर्षक :- मैं भी बेफिक्र हुआ करता था...

मैं भी बेफिक्र हुआ करता था

जब बचपन जिया करता था...


जमीं पर सही से पैर पसार

ख्वाहिश बुनने का जमाना था

पिता की कमाई में ऐश करते थे हम

दो वक्त की रोटी तब कहाँ कमाना था.....

मैं भी बेफिक्र हुआ करता था

जब बचपन जिया करता था...


गली मोहल्ले और औरों के घर नापते

शाम को घूम फिर घर लौट आना था

बचपन क्यूँ चला गया इतनी जल्दी

सुबह उठते ही जिम्मेदारी का बस्ता ले जाना था....

मैं भी बेफिक्र हुआ करता था

जब बचपन जिया करता था...


कच्चे घरों में पक्के सपने पकते थे

वो भी क्या गजब फसाना था

बात और न थी कुछ उस वक़्त

बस बात-बात पर हँसना और हँसाना था.....

मैं भी बेफिक्र हुआ करता था

जब बचपन जिया करता था...


मस्ती मजाक से भरी पूरी थी ज़िंदगानी

नादानियों से भरा बचपन और दिल बचकाना था

खिलखिलाता रहता था आशियाँ मेरा

खूबसूरत मेरे लिए मेरा काशाना था.....

मैं भी बेफिक्र हुआ करता था

जब बचपन जिया करता था...

-नीलम साहू(निम्मू)

कुरूद,धमतरी(छत्तीसगढ़)


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