ज़िंदगी की राह में (कविता) :- नीलम साहू
सिर्फ हमसफर साथ दे ज़िंदगी की राह में
ये जरूरी तो नहीं
आपकी यादों से दूर चले जाऊँ
ऐसी इस दिल ने दी अब तक मंजूरी ही नहीं....
भैय्या निर्भर तो मैं आप पर थी
हर वजह से हर चीज़ में
गिनती में सबसे ऊपर आप ही थे
मेरे ख्वाहिशों के अजीज में.....
कुछ इतने प्यारे वादें किये हुए
आपके जाने के बाद अधूरे रह गए
आखिर बात की बात गूँजती हैं
जो अपने बिना अपना ध्यान रखना कह गए....
यूँ तो अलविदा न कहें कभी
बस जाते-जाते गले लगा जाया करते थे
जो भूल जाओ कोई बात बताना
वापस लौटकर आया करते थे.....
एक बात अधूरी कर गए
उसे पूरा करने आ जाओ न
काँटो की तरह चुभती है नामौजूदगी आपकी
वो रहस्यमय बात बताओ न.....
दरवाजे के बाहर से दस्तक दे
न जाने कितने नाम रख गए
कसमे,वादें,ख़्वाहिशें और नेक इरादें
एक पल में तोड़ गए.....
कितने मोमबत्तियां लगाऊँ इस बारी
और कैसे आपका अवतरण दिवस मनाऊँ इस बार
रात के 12 बजे की फोन कॉल कर
कैसे आपको उठाऊँ इस बार.....
इस रूह और आत्मा की
सिर्फ एक ही इबादत हैं
इस बहन को राखी बांधने वाले
उस अनोखे भाई की चाहत हैं......
✍️ नीलम साहू (छत्तीसगढ़)
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