8/6/26

तेरी निगाह ने ऐसा सुरूर बख़्शा है :- बिलाल क़मर ख़ान


मैं अपने माज़ी के अय्याम छोड़ आया हूँ

पुराने घर के दर ओ बाम छोड़ आया हूँ


जो आ सको तो चले आओ बज़्म-ए-जानां तक

निशान-ए-इश्क़ बह हर गाम छोड़ आया हूँ


तेरी निगाह ने ऐसा सुरूर बख़्शा है

सुराही, मीना, सबू, जाम छोड़ आया हूँ


तमाम उम्र मेरा इंतज़ार तुम करना

तुम्हारे ज़िम्मे यही काम छोड़ आया हूँ


तुम्हारा हुक्म सुना और मारे उजलत में

कहीं चराग़, कहीं शाम छोड़ आया हूँ


तुम्हारे शहर से रुख़्सत तो हो गया हूँ मगर

तुम्हारे नाम का पैग़ाम छोड़ आया हूँ


बिलाल बज़्म-ए-तरब की तलाश में देखो

बहार, चाँद, हसीं शाम छोड़ आया हूँ

बिलाल क़मर ख़ान 

(उत्तरप्रदेश)




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